भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 978 में से

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पृष्ठ 364

३६० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


संस्कृतहिन्दी
स्मरन्नेव पौनःपुन्येन रात्रिशेषमतिवाहयामास ।पुनः स्मरण करते हुए ही उसने शेष रात्रिको बिताया ।
ततः स वन्दिभी राजा स्तुतियुक्ताभिर्वाग्भिः प्रतिबोध्यमान उवाच क्षत्तारं संजिहान एव शयनं निद्रां वा परित्यजन्नेव, हेडङ्ग वत्सारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थ किं माम् ? स एव स्तुत्यर्हो नाहमित्यभिप्रायः । अथवा सयुग्वानं रैक्वमात्थ गत्वा मम तद्दिदृक्षाम्; तदेवशब्दोऽवधारणाथोऽनर्थको वा वाच्यः ।तब वन्दियोंद्वारा स्तुतियुक्त वाक्योंसे जगाये जानेपर राजाने शय्या अथवा निद्राको त्यागते ही सेवकसे कहा—'हे वत्स ! अरे ! क्या तू मुझे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतला रहा है ?' तात्पर्य यह है कि स्तुतिके योग्य तो वही है, मैं नहीं हूँ; अथवा तू जाकर गाड़ीवाले रैक्वको उसे देखनेकी मेरी इच्छा सुना। ऐसा अर्थ होनेपर 'सयुग्वानम् इव' इसमें 'इव' शब्द निश्चयार्थक अथवा अर्थहीन कहना चाहिये।
स च क्षत्ता प्रत्युवाच रैक्वानयनकामो राज्ञोऽभिप्रायज्ञः । यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति राज्ञैवं चोक्त आनेतुं तच्चिह्नं ज्ञातुमिच्छन् यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इत्यवोचत् । स च भल्लाक्षवचनमेवावोचत् ॥ ५-६ ॥राजाके अभिप्रायको जाननेवाले उस सेवकने रैक्वको लानेकी इच्छासे पूछा—'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' अर्थात् राजाके इस प्रकार कहनेपर उसे लानेके लिये उसके चिह्न जाननेकी इच्छासे उसने 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' ऐसा कहा। तब राजाने भल्लाक्षका वचन ही दोहरा दिया ॥ ५-६ ॥

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| तस्य स्मरन्— | उसके कथनको याद रखकर— |