छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 365, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 365
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१
स ह क्षत्तानन्विष्य नाविदमिति प्रत्येयाय तँ होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमच्छेति ॥७॥
वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर 'मैं उसे नहीं पा सका' ऐसा कहता हुआ लौट आया ! तब उससे राजाने कहा—'अरे ! जहाँ ब्राह्मणकी खोज की जाती है वहाँ उसके पास जा' ॥ ७ ॥
| स ह क्षत्ता नगरं ग्रामं वा गत्वान्विष्य रैक्वं नाविदं न व्यज्ञासिषमिति प्रत्येयाय प्रत्यागतवान् । तं होवाच क्षत्तारमरे यत्र ब्राह्मणस्य ब्रह्मविद् एकान्तेऽरण्ये नदीपुलिनादौ विविक्ते देशेऽन्वेषणानुमार्गणं भवति तत्तत्रैनं रैक्वमच्छ ऋच्छ गच्छ तत्र मार्गणं कुर्वित्यर्थः ॥ ७ ॥ | वह सेवक नगर या ग्राममें जाकर वहाँ खोजनेके अनन्तर 'मैंने रैक्वको नहीं जाना—नहीं पहचाना' ऐसा कहता हुआ लौट आया । तब राजाने उस सेवकसे कहा—अरे ! जहाँ एकान्त जंगलमें—नदीके तीर आदि शून्य स्थानोंमें ब्राह्मण-ब्रह्मवेत्ताकी खोज की जाती है वहाँ इस रैक्वके पास 'ऋच्छ' अर्थात् जा यानी वहाँ जाकर उसकी खोज कर ॥ ७ ॥ |
| इत्युक्तः— | इस प्रकार कहे जानेपर— |
|---|
सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तँहाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यह१ँह्यरा ३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताविदमिति प्रत्येयाय ॥८॥
उसने एक छकड़ेके नीचे खाज खुजलाते हुए [ रैक्वको देखा ] । वह उसके पास बैठ गया और बोला—'भगवन् ! क्या आप ही गाड़ी-वाले रैक्व हैं ?' तब रैक्वने 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' ऐसा कहकर स्वीकार