छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें३६४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४
और] हे भगवन्! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं॥ २ ॥
| हे रैक गवां षट् शतानीमानि तुभ्यं मयानीतानि, अयं निष्कोऽश्वतरीरथश्चायमेतद्धनमादत्स्व, भगवोऽनुशाधि च मे मामेताम्, यां च देवतां त्वमुपास्से तद्देवतोपदेशेन मामनुशाधीत्यर्थः ॥२॥ | हे रैक्व! मैं आपके लिये ये छः सौ गौएँ लाया हूँ तथा यह हार और खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ भी लाया हूँ, इस धनको ले लीजिये और हे भगवन्! मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये जिसकी आप उपासना करते हैं; अर्थात् उस देवताका उपदेश करनेके द्वारा मेरा अनुशासन कीजिये ॥ २ ॥ |
तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति। तदु ह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥
उस राजासे दूसरे [अर्थात् रैक्व] ने कहा—'ऐ शूद्र! गौओंके सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे।' तब वह जानश्रुति पौत्रायण एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और अपनी कन्या—इतना धन लेकर फिर उसके पास आया ॥ ३ ॥
| तमेवमुक्तवन्तं राजानं प्रत्युवाच परो रैकः; अहेत्ययं निपातो विनिग्रहार्थी योऽन्यत्रेह त्वनर्थकः, एवशब्दस्य पृथक्प्रयोगात्। हारेत्वा हारेण युक्ता इत्वा गन्त्री | इस प्रकार कहते हुए उस राजासे उस द्वितीय व्यक्ति—रैक्वने कहा—'अह' यह निपात दूसरी जगह 'विनिग्रह' अर्थमें प्रयुक्त होता है, किंतु यहाँ 'एव' शब्दका पृथक् प्रयोग रहनेके कारण निरर्थक है। हारसे युक्त जो इत्वा—गाड़ी |