छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 367, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 367
द्वितीय खण्ड
रैकके प्रति जानश्रुतिकी उपसत्ति
तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायणः षट्शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमेतं हाभ्युवाद ॥ १ ॥
तब वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, एक हार और एक खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ लेकर उसके पास आया और बोला ॥१॥
| तत्तत्र ऋषेर्गाईस्थ्यं प्रत्यभिप्रायं बुद्ध्वा धनार्थितां च उ ह एव जानश्रुतिः पौत्रायणः षट्शतानि गवां निष्कं कण्ठहारमश्वतरीरथमश्वतरीभ्यां युक्तं रथं तदादाय धनं गृहीत्वा प्रतिचक्रमे रैक्वं प्रति गतवान् । तं च गत्वाभ्युवाद हाभ्युक्तवान् ॥ १ ॥ | तब [ सेवकके कथनसे ] ऋषिका गृहस्थाश्रम-सम्बन्धी अभिप्राय और धनकी इच्छा जान वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, निष्क—गलेका हार और एक अश्वतरीरथ—दो अश्वतरियों [ खच्चरियों ] से जुता हुआ रथ—यह इतना धन लेकर रैक्वके पास चला । और उसके पास जाकर अभिवादन किया अर्थात कहा ॥ १ ॥ |
रैक्वेमानि षट्शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथो नु म एतां भगवो देवताꣳशाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥
'हे रैक्व ! ये छः सौ गौएँ, यह हार और यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ मैं [ आपके लिये ] लाया हूँ । [ आप इस धनको स्वीकार कीजिये