भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 978 में से

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पृष्ठ 370

३६६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


| न च शुश्रूषया, न तु जात्यैव शूद्र इति । | [ इसलिये उसे 'शूद्र' कहा हो ] वह जातिसे ही शूद्र हो—ऐसी बात नहीं है । | | अपरे पुनराहुरल्पं धनमाहृतमिति रुषैवैनमुक्तवाञ्शूद्रेति ।<br><br>लिङ्गं च बह्वाहरण उपादानं धनस्येति । | परंतु अन्य लोग ऐसा कहते हैं कि वह थोड़ा धन लाया था इसलिये रोषवश उसे 'शूद्र' कहा था; बहुत-सा धन लानेपर उसे ग्रहण कर लेना इस बातको सूचित करता है। | | तदु हपेर्मतं ज्ञात्वा पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणो गवां सहस्रमधिकं जायां चर्षेरभिमतां दुहितरमात्मनस्तदादाय प्रतिचक्रमे क्रान्तवान् ॥ ३ ॥ | तब ऋषिका अभिप्राय समझकर राजा जानश्रुति पौत्रायण पहलेसे अधिक करके एक सहस्र गौएँ तथा ऋषिको अभीष्ट पत्नीरूपा अपनी एक कन्या लेकर फिर उसके पास गया ॥ ३ ॥ |


तꣳहाभ्युवाद रैक्वेदꣳसहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायायं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥ तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास स तस्मै होवाच ॥ ५ ॥

और उस (रैक्व) से कहा—'हेरैक्व ! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ, यह पत्नी और यह ग्राम जिसमें कि आप हैं लीजिये और हे भगवन् ! मुझे अवश्य अनुशासित कीजिये' ॥४॥

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