भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्याथ [ ३६७


तब उस (राजकन्या) के मुखको ही [विद्याग्रहणका द्वार] समझते हुए रैक्वने कहा—'अरे शूद्र! तू ये (गौएँ आदि) लाया है [सो ठीक है;] तू इस विद्याग्रहणके द्वारसे ही मुझसे भाषण कराता है।' इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था वे रैक्वपर्णीनामक ग्राम महावृष देशमें प्रसिद्ध हैं। तब उसने उससे कहा ॥ ५ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
रैक्वेदं गवां सहस्रमयं निष्को-<br>ऽयमश्वतरीरथ इयं जायार्थं मम<br><br>दुहितानीतायं च ग्रामो यस्मि-<br><br>न्नास्से तिष्ठसि स च त्वदर्थे मया<br><br>कल्पितः। तदेतत्सर्वमादायानु-<br><br>शाध्येव मा मां हे भगवः।[और रैक्वसे कहा—] 'हे रैक्व! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे युक्त रथ और यह पत्नी अर्थात् आपकी भार्या होनेके लिये अपनी कन्या लाया हूँ; तथा जिसमें आप रहते हैं वह गाँव भी मैंने आपहीके लिये निश्चित कर दिया है। हे भगवन्! इन सबको ग्रहणकर आप मुझे उपदेश कर ही दीजिये।'
इत्युक्तस्तस्या जायार्थमानी-<br>ताया राज्ञो दुहितुर्हैव मुखं द्वारं<br>विद्याया दाने तीर्थमुपोद्गृह्णञ्जान-<br>न्नित्यर्थः। “ब्रह्मचारी धनदायी<br>मेधावी श्रोत्रियः प्रियः। विद्यया<br>वा विद्यां प्राह तानि तीर्थानि<br>षण्मम” इति विद्याया वचनं<br>विज्ञायते हि।ऐसा कहे जानेपर भार्या होनेके लिये लायी गयी उस राजकन्याके मुखको ही विद्यादानका द्वार अर्थात् तीर्थ जानते हुए [रैक्वने कहा—] ऐसा इसका तात्पर्य है। इस विषयमें विद्याका यह वचन प्रसिद्ध है—“ब्रह्मचारी धन देनेवाला बुद्धिमान्, श्रोत्रिय, प्रिय और जो विद्याके बदलेमें विद्याका उपदेश करता है—ये छः मेरे तीर्थ हैं।”
एवं जानन्नुपोद्गृह्णन्नुवाचो-<br>क्तवान्—आजहाराहृतवान्म-ऐसा जानकर अर्थात् ग्रहण कर रैक्वने कहा—'तू जो ये गौएँ तथा