छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 372, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 372
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| ३६८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| वान्यदिमा गा यच्चान्यद्धनं तत्साध्विति वाक्यशेषः। शूद्रेति पूर्वोक्तानुकृतिमात्रं न तु कारणान्तरापेक्षया पूर्ववत्। अनेनैव मुखेन विद्याग्रहणतीर्थेनालापयिष्यथा आलापयसीति मां भाषयसीत्यर्थः। | अन्य धन लाया है; यह ठीक ही है,—ऐसा वाक्यशेष है। यहाँ जो 'शूद्र' ऐसा सम्बोधन है यह पूर्वोक्तका अनुकरणमात्र ही है, पूर्ववत किसी अन्य कारणकी अपेक्षासे नहीं है। इस मुख यानी विद्याग्रहणके द्वारसे ही तू मुझसे आलाप अर्थात् सम्भाषण कराता है। |
| ते हैते ग्रामा रैक्वपर्णा नाम विख्याता महावृषेषु देशेषु यत्र येषुग्रामेषूवासोषितावान्रैक्वः, तानस्मै ग्रामानदादस्मै रैक्वाय राजा। तस्मै राज्ञे धनं दत्तवते ह किलोवाच विद्यां स रैक्वः॥४-२-५॥ | वे ये रैक्वपर्ण नामसे प्रसिद्ध ग्राम महावृष देशमें हैं, जिन ग्रामोंमें कि रैक्व रहा करता था, वे ग्राम राजाने इस रैक्वको दे दिये। इस प्रकार धन देनेवाले उस राजाको रैक्वने विद्याका उपदेश किया॥४-५॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये द्वितीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२॥
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