छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 373, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 373
तृतीय खण्ड
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रैकद्वारा संवर्गविद्याका उपदेश
वायुर्वाव संवर्गो यदा वा अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥
वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमें ही लीन हो जाता है ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| वायुर्वाव संवर्गो वायुर्वाह्यो वावेत्यवधारणार्थः । संवर्गः संवर्जनात्संग्रहणात्संग्रसनाद्वा संवर्गः । वक्ष्यमाणा अग्नयाद्या देवता आत्मभावमापादयतीत्यतः संवर्गः । संवर्जनाख्यो गुणो ध्येयो वायुवत, कृतायान्तर्भावदृष्टान्तात् । कथं संवर्गत्वं वायोः ? इत्याह—यदा यस्मिन्काले वा अग्निरुद्वायत्युद्वासनं प्राप्नो- | वायु ही संवर्ग है। यहाँ 'वायु' शब्दसे बाह्यवायु अभिप्रेत है। 'वाव' यह निपात निश्चयार्थक है। संवर्जन—संग्रहण अथवा संग्रसन करनेके कारण वह संवर्ग है। आगे कहे जानेवाले अग्नि आदि देवताओंको वायु अपने स्वरूपमें मिला लेता है इसलिये वह संवर्ग है। कृतनामक पासेमें जैसे अन्य पासोंका अन्तर्भाव हो जाता है उसी दृष्टान्तके अनुसार वायुके समान संवर्जनसंज्ञक गुणका चिन्तन करना चाहिये। वायुकी संवर्गता किस प्रकार है ? इस विषयमें श्रुति कहती है—जब अर्थात् जिस समय अग्नि उद्वासनको प्राप्त होता है अर्थात् |