छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९३
[ हंसने कहा— ] हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला— ] 'भगवान् मुझे बतलावें।' तब वह उससे बोला— 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है और विद्युत कला है। हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है' ॥३॥
स च एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिँल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥
जो कोई इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको ज्योतिष्मान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युतकलैष वै सोम्येति ज्योतिर्विषयमेव च दर्शनं प्रोवाचातो हंसस्यादित्यत्वं प्रतीयते। विद्वत्फलम्—ज्योतिष्मान्दीप्तियुक्तोऽस्मिँल्लोके भवति । चन्द्रादित्यादीनां ज्योतिष्मत एव च मृत्वा लोकाञ्जयति; समानमुत्तरम् ॥ ३-४ ॥ | 'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्र कला है, विद्युत कला है, हे सोम्य यह' इत्यादि वाक्यसे उसने ज्योतिर्विषयक दर्शनका ही निरूपण किया है; इससे हंसका आदित्यत्व प्रतीत होता है । इस प्रकारके विद्वान्को प्राप्त होनेवाला फल—वह इस लोकमें ज्योतिष्मान्—दीप्तियुक्त होता है तथा मरनेपर चन्द्र एवं आदित्यादिके ज्योतिष्मान् लोकोंको ही जीत लेता है। आगेका अर्थ पूर्ववत् है ॥ ३-४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥