छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 401, कुल 978 में से
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नवम खण्ड
—: ० :—
सत्यकामका आचार्यकुलमें पहुँचकर आचार्यद्वारा पुनः उपदेश ग्रहण करना
| स एवं ब्रह्मवित्सन्— | इस प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता होकर— |
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प्राप हाचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥
आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया—'भगवन् !' ॥ १ ॥
| आप ह प्राप्तवानाचार्यकुलम् । तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकाम ३ इति । भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥ | आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥ |
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ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥
'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया है ?' ऐसा [आचार्यने पूछा] तब उसने उत्तर दिया 'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें' ॥ २ ॥
| ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि । <br><br> प्रसन्नेन्द्रियः प्रहसितवदनश्च | 'हे सोम्य ! तू ब्रह्मवेत्ता-सा भासित हो रहा है।' कृतार्थ ब्रह्मवेत्ता ही प्रसन्नेन्द्रिय, हास्ययुक्त मुख- |
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