छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 400, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें३९६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४
वह जो इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्' होता है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है, जो कोई कि इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे गुणसे युक्त उपासना करता है ॥ ४ ॥
| तं पादं तथैवोपास्ते यः स आयतनवानाश्रयवानस्मिँल्लोके भवति । तथायतनवत एव सावकाशाँल्लोकान्मृतो जयति । य एतमेवमित्यादि पूर्ववत् ॥ ४ ॥ | उस पादकी जो उसी प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें 'आयतनवान्'—आश्रयवाला होता है तथा मरनेपर आयतनवान्—अवकाशयुक्त लोकोंको ही जीतता है । 'य एतमेवम्' इत्यादि वाक्य का अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्यायेऽष्टमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ८ ॥