छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९५
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलाः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥
[ मद्गु बोला—] 'हे सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' [ सत्यकाम बोला—] 'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब वह उससे बोला— 'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है और मन कला है । हे सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'आयतनवान्' नामवाला है' ॥ ३ ॥
| स च मद्गुः प्राणः स्वविषयमेव च दर्शनमुवाच प्राणः कलेत्याद्यायतनवानित्येवं नाम । आयतनं नाम मनः सर्वकरणोपहृतानां भोगानां तद्यस्मिन्पादे विद्यत इत्यायतनवान्नाम पादः ॥ २-३ ॥ | उस मद्गु यानी प्राणने भी 'प्राण कला है' इत्यादि 'आयतनवान्' इस नामवाला पाद है, ऐसा कहकर अपनेसे सम्बद्ध दर्शनका ही निरूपण किया । समस्त इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए भोगोंका आयतन मन ही है, वह जिस पादमें विद्यमान है वह पाद 'आयतनवान्' नामवाला है ॥ २–३ ॥ |
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स य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्त आयतनवानस्मिँल्लोके भवत्यायतनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वाँश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥