भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 405, कुल 978 में से

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पृष्ठ 405

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ४०१


नां परिचरणं कृतवान् । स ह स्माचार्योऽन्यान्ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायं ग्राहयित्वा समावर्तयंस्तमेवोपकोसलमेकं न समावर्तयति स्म ह ॥ १ ॥परिचर्या—सेवा की । किन्तु उस आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो स्वाध्याय ग्रहण कराकर समावर्तन कर दिया, किन्तु उस उपकोसलका ही समावर्तन नहीं किया ॥ १ ॥

तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन्परिचचारीन्मा त्वाग्नयः परिप्रवोचन्प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥

उस ( आचार्य ) से उसकी भार्याने कहा—'यह ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियोंकी सेवा की है। [ देखिये ] अग्नियाँ आपकी निन्दा न करें। अतः इसे विद्याका उपदेश कर दीजिये।' किन्तु वह उसे उपदेश किये बिना ही बाहर चला गया ॥ २ ॥


तमाचार्यं जायोवाच [उपकोसलाय विद्यां ब्रूहीति पतिं प्रत्याचार्यपत्न्या अनुरोधः] तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं सम्यगग्नीन्परिचचारीत्परिचरितवान् । भगवांश्चाग्निषु भक्तं न समावर्तयति । अतोऽस्मद्भक्तं न समावर्तयतीति ज्ञात्वा त्वामग्नयो मा परिप्रवोचन्गर्हां तव मा कुर्युः । अतः प्रब्रूह्यस्मै विद्यामि-उस आचार्यसे उसकी भार्याने कहा—'इस ब्रह्मचारीने खूब तपस्या की है; इसने अग्नियोंकी अच्छी तरह सेवा की है ! किन्तु श्रीमान् तो अग्नियोंमें भक्ति रखनेवाले इसका समावर्तन ही नहीं करते । अतः 'यह हमारे भक्तका समावर्तन नहीं करता'—ऐसा जानकर अग्नियाँ आपका परिवाद—आपकी निन्दा न करें; इसलिये इस उपकोसलको इसकी अभीष्ट विद्याका उपदेश कर दीजिये।'