भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 408, कुल 978 में से

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पृष्ठ 408

४०४ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४


स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥

वह बोला—'यह तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किंतु 'कं' और 'ख' को नहीं जानता।' तब वे बोले—'निश्चय जो 'कं' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'कं' है।' इस प्रकार उन्होंने उसे प्राण और उसके [ आश्रयभूत ] आकाशका उपदेश किया ॥ ५ ॥

| [उपदिष्यमानस्य ब्रह्मचारिणः शङ्का]<br><br>स होवाच ब्रह्मचारी विजानाम्यहं यद्भवद्भिरुक्तं प्रसिद्धपदार्थकत्वात्प्राणो ब्रह्मेति; यस्मिन्सति जीवनं यदपगमे च न भवति, तस्मिन्वायुविशेषे लोके रूढः; अतो युक्तं ब्रह्मत्वं तस्य । तेन प्रसिद्धपदार्थकत्वाद्विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्मेति । कं च तु खं च न विजानामीति ।<br><br>ननु कंखंशब्दयोरपि सुखाकाशविषयत्वेन प्रसिद्धपदार्थक- | वह ब्रह्मचारी बोला—'आपने जो कहा कि प्राण ब्रह्म है, सो प्रसिद्ध पदार्थवाला होनेके कारण यह तो मैं जानता हूँ, जिसके रहनेपर जीवन रहता है और जिसके चले जानेपर जीवन भी नहीं रहता लोकमें उस वायुविशेषमें ही 'प्राण' शब्द रूढ है। अतः उसका ब्रह्म-रूप होना तो उचित ही है। अतः प्रसिद्ध पदार्थयुक्त होनेके कारण यह तो मैं जानता हूँ कि 'प्राण ब्रह्म-है' किंतु 'कं' और 'ख' को मैं नहीं जानता।'<br><br>शङ्का—सुख और आकाश-विषयक होनेके कारण 'कं' और 'ख' शब्द भी तो प्रसिद्ध पदार्थवाले ही |