भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 423
खण्ड १४]शाङ्करभाष्यार्थ४१९

| जज्ञे प्रतिज्ञातवान्प्रतीकमात्रं किञ्चिन्न सर्वं यथोक्तमग्निभिरुक्तमवोचत् ।<br><br>यत आहाचार्यो लोकान्वाव पृथिव्यादीन्हे सोम्य किल तेऽवोचन्न ब्रह्म साकल्येन । अहं तु ते तुभ्यं तद्ब्रह्म यदिच्छसि त्वं श्रोतुं वक्ष्यामि, शृणु तस्य मयोच्यमानस्य ब्रह्मणो ज्ञानमाहात्म्यम्—यथा पुष्करपलाशे पद्मपत्र आपो न श्लिष्यन्त एवं यथा वक्ष्यामि ब्रह्मैवंविवि पापं कर्म न श्लिष्यते न संबध्यत इत्येवमुक्तवत्याचार्य आहोपकोसलो ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाचार्यः ॥ २-३ ॥ | ऐसा कहा, अर्थात् कुछ प्रतीकमात्र ही बतलाया, अग्नियोंका कहा हुआ सारा उपदेश यथावत् नहीं कहा ।<br><br>अतः आचार्यने कहा—'हे सोम्य ! अग्नियोंने तुझे पृथिवी आदि लोक ही बतलाये हैं, ब्रह्मका पूर्णतया उपदेश नहीं किया । अब मैं तुझे उस ब्रह्मका उपदेश करूँगा, जिसे कि तू सुनना चाहता है । मेरेद्वारा कहे जाते हुए उस ब्रह्मके ज्ञानका माहात्म्य सुन—जिस प्रकार पुष्कर-पलाश—कमलपत्रमें जल श्लिष्ट-सम्बद्ध नहीं होता उसी प्रकार जैसे ब्रह्मका मैं उपदेश करूँगा उसे जाननेवालेमें पापकर्मका सम्बन्ध नहीं होता ।' आचार्यके इस प्रकार कहनेपर उपकोसलने कहा—'भगवान् मुझे बतलावें ।' तब आचार्य उससे बोले ॥ २-३ ॥ |

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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १४ ॥

छा० उ० १४—