छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 463, कुल 978 में से
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५१
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| णाह-तद्वा एतद्यत्किञ्चिदिलोके प्राणिभिरन्नमद्यतेऽनस्य प्राणस्य तदन्नं प्राणेनैव तदद्यत इत्यर्थः । | है—'यह जो कुछ अन्न इस लोकमें प्राणियोंद्वारा भक्षित होता है वह अन—प्राणका ही अन्न है; अर्थात् वह प्राणसे ही भक्षित होता है ।' |
| सर्वप्रकारचेष्टाव्याप्तिगुणप्रदर्शना-र्थमन इति प्राणस्य प्रत्यक्ष नाम । प्राद्युपसर्गपूर्वत्वे हि विशेषगतिरेव स्यात् । तथा च सर्वान्नानामत्तुर्नामग्रहणमितीदं प्रत्यक्षं नामान इति सर्वान्नानामत्तुः साक्षादभिधानम् । | प्राणका सब प्रकारकी चेष्टामें व्याप्तिरूप गुण प्रदर्शित करनेके लिये उसका 'अन' यह प्रत्यक्ष नाम है, क्योंकि 'प्र' आदि उपसर्ग पूर्वमें रहनेपर उसकी विशेष गति ही सिद्ध होती है ।* इस प्रकार सम्पूर्ण अन्नोंको भक्षण करनेवाले प्राणका नाम ग्रहण किया गया है अतः उसका 'अन' यह प्रत्यक्ष नाम है; अर्थात् यह सर्वान्नभक्षी प्राणका साक्षात् नाम है । |
| न ह वा एवंविदि यथोक्तप्राणविदि प्राणोऽहमस्मि सर्वभूतस्थः सर्वान्नानामत्तेति, तस्मिन्नेवंविदि ह वै किञ्चन किञ्चिदपि प्राणिभिराद्यं सर्वैरन्नमनाद्यं न भवति सर्वमेवंवित्यन्नं भवतीत्यर्थः; | इस प्रकार जाननेवाले—उपर्युक्त प्राणवेत्ताके लिये, अर्थात् जो यह जानता है कि मैं सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित सारे अन्नोंका भोक्ता प्राण हूँ उसके लिये कुछ भी, समस्त प्राणियोंद्वारा भक्षित होनेवाला कोई भी अन्न, अभक्ष्य नहीं होता । तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जाननेवालेके लिये सभी अन्न है, |
* 'अन प्राणने' इस धातुपाठके अनुसार 'अन' शब्द गतिशीलका वाचक है । उसके पहले प्र, अप, उत्+आ, वि+आ इन उपसर्गोंके तथा 'सम्' शब्दके लगनेसे क्रमशः प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान शब्द सिद्ध होते हैं । इनके योगसे मुख्य प्राणका गतिभेद ही द्योतित होता है ।