छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 476, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 476
तृतीय खण्ड
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पाञ्चालोंकी सभामें श्वेतकेतु
| ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ताः संसारगतयो वक्तव्या वैराग्यहेतोर्मुमुक्षूणामित्यत आख्यायिकारभ्यते-- | मुमुक्षु पुरुषोंके वैराग्यके लिये ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त संसारकी गतियोंका वर्णन करना चाहिये—इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है— |
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श्वेतकेतुर्हारुणेयः पञ्चालानाꣳसमितिमेयाय तꣳह प्रवाहणो जैवलिरुवाच कुमारानु त्वाशिषत्पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥
आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालदेशीय लोगोंकी सभामें आया । उससे जीवलके पुत्र प्रवाहणने कहा—'हे कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है !' इसपर उसने कहा—'हाँ, भगवन् !' ॥ १ ॥
| श्वेतकेतुर्नामतः, ह इत्यैतिह्यार्थः, अरुणस्यापत्यमारुणिस्तस्यापत्यमारुणेयः पञ्चालानां जनपदानां समितिं सभामेयायाजगाम । तमागतवन्तं ह प्रवाहणो नामतो जीवलस्यापत्यं जैवलिरुवाचोक्तवान् । हे कुमारानु त्वा त्वामशिषदन्वशिषत्पिता ? किमनुशिष्टस्त्वं | श्वेतकेतु नामवाला—'ह' यह निपात ऐतिह्यके लिये है—अरुणके पुत्रको आरुणि कहते हैं, उसका पुत्र आरुणेय पञ्चाल देशके लोगोंकी सभामें आया । उस आये हुएसे प्रवाहण नामवाले जीवलके पुत्र जैवलिने कहा---'हे कुमार ! क्या पिताने तुझे अनुशासित (शिक्षित) किया है ?' अर्थात् 'क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' ऐसा कहे |
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