छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 478, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४७४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| वेत्थ पथोर्मार्गयोः सहप्रयाणयोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना व्यावर्तनमितरेतरवियोगस्थानं सह गच्छताम् ? इत्यर्थः । न भगव इति ॥२॥ | तुझे साथ-साथ जानेवाले देवयान और पितृयाण इन दोनों मार्गोंकी व्यावर्तना--व्यावर्तन अर्थात् इनपर साथ-साथ जानेवाले पुरुषोंके एक दूसरेसे अलग होनेके स्थानका पता है ? 'भगवन् ! नहीं ॥ २ ॥ |
वेत्थ यथासौ लोको न संपूर्यत ३ इति न भगव इति । वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति ? नैव भगव इति ॥ ३ ॥
[ प्रवाहण— ] 'तुझे मालूम है, यह पितृलोक भरता क्यों नहीं ?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं ।' [ प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप ( सोमघृतादि रस ) 'पुरुष' संज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं ?' [ श्वेतकेतु—] नहीं, 'भगवन् ! नहीं' ॥३॥
| वेत्थ यथासौ लोकः पितृसम्बन्धी–यं प्राप्य पुनरावर्तन्ते, बहुभिः प्रयद्भिरपि येन कारणेन न सम्पूर्यत इति ? न भगवत इति प्रत्याह । वेत्थ यथा येन क्रमेण पञ्चम्यां पञ्चसंख्याकायामाहुतौ हुतायामाहुतिनिर्वृत्ता आहुतिसाधनाश्चापः पुरुषवचसः पुरुष इत्येवं वचोऽभिधानं यासां हूय- | 'क्या तू जानता है कि यह पितृगणसम्बन्धी लोक, जिसे प्राप्त होकर फिर लौट आते हैं, बहुतोंके जानेपर भी किस कारणसे नहीं भरता ?' 'भगवन् ! नहीं' ऐसा उसने उत्तर दिया । 'क्या तुझे मालूम है कि किस प्रकार-किस क्रमसे पाँचवीं–पाँच संख्यावाली आहुतिके हुत होने पर आहुतिमें रहनेवाले आहुतिके साधनभूत आप पुरुषवाची हो जाते हैं ? तात्पर्य यह है कि हवन किये जानेवाले |