छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 487, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८३
| इह सायं प्रातरग्निहोत्राहुती हुते पयआदिसाधने श्रद्धापुरःसरे आहवनीयाग्निसमिद्धूमार्चिरङ्गारविस्फुलिङ्गभाविते कर्त्रादिकारकभाविते चान्तरिक्षक्रमेणोत्क्रम्य द्युलोकं प्रविशन्त्यौ सूक्ष्मभूते अप्समवायित्वादप्शब्दवाच्ये श्रद्धाहेतुत्वाच्च श्रद्धाशब्दवाच्ये। तयोरधिकरणोऽग्निः, अन्यच्च तत्संबद्धं समिदादीत्युच्यते। या चासावग्न्यादिभावना हुत्योः साऽपि तथैव निर्दिश्यते। | इस लोकमें जल आदि जिनके साधन हैं, जो श्रद्धापूर्वक निष्पन्न की जाती हैं, जिनमें आहवनीय अग्नि, समिध्, धूम, अर्चि, अङ्गार और विस्फुलिङ्गकी तथा कर्ता आदि कारककी भावना की गयी है, वे अग्निहोत्रकी सायंकालिक एवं प्रातःकालिक दो आहुतियाँ अन्तरिक्षक्रमसे उत्क्रमण कर द्युलोकमें प्रवेश करती हुई सूक्ष्म एवं अप्-समवायिनी (जलमयी) होनेके कारण 'अप्' शब्दकी वाच्य हैं और श्रद्धाजनित होनेके कारण 'श्रद्धा' शब्दकी वाच्य हैं। यहाँ उनके आश्रयभूत अग्नि और उससे सम्बद्ध जो समिध् आदि हैं उनका वर्णन किया जाता है तथा उन आहुतियोंमें जो अग्नि आदिकी भावना है उसका भी उसी प्रकार निर्देश किया जाता है। |
लोकरूपा अग्निविद्या
असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! यह प्रसिद्ध [द्यु-] लोक ही अग्नि है। उसका आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) हैं ॥ १ ॥
छा० उ० १६—