छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| समिधं मरीचीरेव शुक्लामाहुतिं ते अन्तरिक्षं तर्पयतस्ते तत उत्क्रामतः'' इत्यादि; एवमेव पूर्ववद्दिवं तर्पयतस्ते तत आवर्तेते । इमामाविश्य तर्पयित्वा पुरुषमाविशतः । ततः स्त्रियमाविश्य लोकं प्रत्युत्थायी भवतोति । | शुक्ल आहुति बनाती हैं; इस प्रकार ये अन्तरिक्षलोकको तृप्त करती हैं* फिर वहाँसे [ यजमानके उत्क्रमण करनेपर ] वे उत्क्रमण करती हैं" इत्यादिरूपसे इसी तरह पहलेहीके समान द्युलोकको [ द्युलोकस्थ यजमानको फलप्रदानद्वारा ] तृप्त करती हैं । तत्पश्चात् [ प्रारब्धक्षय होनेपर यजमानके पुनरावर्तन करनेपर ] वे वहाँसे लौट आती हैं, तथा इस लोकमें प्रवेश कर इसे तृप्त करनेके अनन्तर [रेतःसेकमें समर्थ] पुरुषमें प्रवेश करती हैं । फिर स्त्रीमें प्रवेश कर वे परलोकके प्रति [ लौकिक कर्म कराती हुई ] उत्थान करनेवाली होती हैं । † | | तत्राग्निहोत्राहुत्योः कार्यारम्भमात्रमेवंप्रकारं भवतीत्युक्तम् । इह तु तं कार्यारम्भमग्निहोत्रापूर्वपरिणामलक्षणं पञ्चधा प्रविभज्याग्नित्वेनोपासनमुत्तरमार्गप्रतिपत्तिसाधनं विधित्सन्नाह । असौ वाव लोको गौतमाग्निरित्यादि । | वहाँ ( वाजसनेयोपनिषद्में ) तो यह बतलाया गया था कि अग्निहोत्रकी आहुतियोंका केवल कार्यारम्भमात्र इस प्रकार होता है; किंतु यहाँ अग्निहोत्रके अपूर्वके परिणामरूप उस कार्यारम्भको पाँच प्रकारसे विभक्त कर उनमें उत्तरमार्गकी प्राप्तिके साधनभूत अग्निभावसे उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति 'असौ वाव लोको गौतमाग्निः' इत्यादि कथन करती है । |
* अर्थात् अन्तरिक्षलोकस्थ यजमानको फलोन्मुख करती हैं ।
† अर्थात् गर्भरूपसे उत्पन्न हुए यजमानको कर्मानुष्ठानमें समर्थ देहकी प्राप्ति करा उसके द्वारा पारलौकिक कर्म कराती हुई उसका परलोकके प्रति गमन कराती हैं !