छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 485, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ खण्ड
पञ्चम प्रश्नका उत्तर
| पञ्चम्यामाहुतावाप इत्ययं प्रश्नः प्राथम्येनापाक्रियते । तदपाकरणमन्वितरेषामपाकरणमनुकूलं भवेदिति । अग्निहोत्राहुत्योः कार्यारम्भो यः स उक्तो वाजसनेयके । तं प्रति प्रश्नाः, उत्क्रान्तिराहुत्योर्गतिः प्रतिष्ठा तृप्तिः पुनरावृत्तिर्लोकं प्रत्युत्थायीति । तेषां चापाकरणमुक्तं तत्रैव—‘ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतस्ते अन्तरिक्षमाविशतस्ते अन्तरिक्षमेवाहवनीयं कुर्वते वायुं | अब 'पाँचवीं आहुतिमें आप (जल) पुरुषसंज्ञक क्यों हो जाते हैं?' इस प्रश्नका सबसे पहले निराकरण किया जाता है, क्योंकि उसका निराकरण होनेपर अन्य प्रश्नोंका निराकरण सुगम हो जायगा । अग्निहोत्रकी [ प्रातःकालिक और सायंकालिक ] दोनों आहुतियोंका जो कार्यारम्भ है वह वाजसनेयोपनिषद्में बतला दिया गया है । वहाँ उस ( कार्यारम्भ ) के विषयमें उन दोनों आहुतियोंकी उत्क्रान्ति, गति, प्रतिष्ठा, तृप्ति, पुनरावृत्ति तथा लोकोंके प्रति उत्थान करना-ये छः प्रश्न हैं । वहीं उनका निराकरण भी इस प्रकार बतलाया गया है—‘‘वे ये आहुतियाँ हवन किये जानेपर [ अपूर्वरूप होकर उत्क्रमण करते हुए यजमानको आवृत कर उसके साथ ] उत्क्रमण करती हुई अन्तरिक्षलोकमें प्रवेश करती हैं; और अन्तरिक्षलोकको ही आहवनीय, वायुको समिध् तथा किरणोंको |