छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 484, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४८० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| विद्यां यच्च पश्चाच्चिरं वसेत्याज्ञाप्तवान्, तन्निमित्तं ब्राह्मणं क्षमापयति हेतुवचनोक्त्या ।<br><br>तं होवाच राजा सर्वविद्यो ब्राह्मणोऽपि सन्नयथा येन प्रकारेण मा मां हे गौतमावदस्त्वं तामेव विद्यालक्षणां वाचं मे ब्रूहीत्यज्ञानात्तेन त्वं जानीहि । तत्रास्ति वक्तव्यं यथा येन प्रकारेणेयं विद्या प्राक् त्वत्तो ब्राह्मणान्न गच्छति न गतवती । न च ब्राह्मणा अनया विद्ययानुशासितवन्तः । तथैतत्प्रसिद्धं लोकेयतस्तस्मादु पुरा पूर्वं सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव क्षत्रजातेरेवानया विद्यया प्रशासनं प्रशास्तृत्वं शिष्याणामभूद्बभूव । क्षत्रियपरम्परयैवेयं विद्यैतावन्तं कालमागता, तथाप्यहमेतां तुभ्यं वक्ष्यामि त्वत्सम्प्रदानादूर्ध्वं ब्राह्मणान्गमिष्यति । अतो मया यदुक्तं तत्क्षन्तुमर्हसीत्युक्त्वा तस्मै होवाच विद्यां राजा ॥७॥ | स्थान किया और फिर उसे 'चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, उसका कारण बतलाते हुए वह ब्राह्मणसे क्षमा कराता है।<br><br>राजाने उससे कहा—'सर्वविद्यासम्पन्न ब्राह्मण होनेपर भी हे गौतम ! तुमने जिस प्रकार मुझसे 'उस विद्यारूप वाणीको ही मेरे प्रति कहो' इस प्रकार अज्ञानपूर्वक कहा है इससे तुम यह जानो। उसमें यह कारण बतलाता है कि जिससे यह विद्या तुमसे पहले ब्राह्मणोंमें नहीं गयी तथा इस विद्याद्वारा ब्राह्मणोंने उपदेश ही नहीं किया; क्योंकि इस प्रकार यह बात इस लोकमें प्रसिद्ध है इसीसे पूर्वकालमें समस्त लोकोंमें क्षत्रियका ही--क्षत्रियजातिका ही इस विद्याके द्वारा शिष्योंका शासन--शिक्षकत्व रहा है। अर्थात् क्षत्रियोंकी परम्परासे ही इतने समयतक यह विद्या आयी है। तथापि मैं तुम्हारे प्रति इसका उपदेश करूँगा। तुम्हें देनेके पश्चात् यह ब्राह्मणोंके पास जायगी। इसलिये मैंने जो कुछ कहा है उसे क्षमा करना। ऐसा कहकर राजाने उसे विद्याका उपदेश किया ॥ ७ ॥ |
--: ० :-- इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥ -—: ० :—-