छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 483, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३] शाङ्करभाष्यार्थ ४७९
| स होवाच गौतमः—तवैव तिष्ठतु राजन्मानुष वित्तम्; यामेव कुमारस्य मम पुत्रस्यान्ते समीपे वाचं पञ्चप्रश्नलक्षणामभाषथा उक्तवानसि तामेव वाचं मे मह्यं ब्रूहि कथयेत्युक्तो गौतमेन राजा सह कृच्छ्री दुःखी बभूव—कथं न्विदामिति ॥६॥ | उस गौतमने कहा—‘हे राजन् ! यह मनुष्यसम्बन्धी धन तुम्हारे ही पास रहे । तुमने कुमार अर्थात् मेरे पुत्रके प्रति जो पाँच प्रश्नरूप बात कही थी वही मुझसे कहो । गौतमके इस प्रकार कहनेपर वह राजा यह कहता हुआ कि ‘यह कैसे हो सकता है?’ कृच्छ्री --दुखी हो गया ॥ ६ ॥ |
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प्रवाहणका वरप्रदान
| स ह कृच्छ्रीभूतोऽप्रत्याख्येयं ब्राह्मणं मन्वानो न्यायेन विद्या वक्तव्येति मत्वा— | इस प्रकार दुखी हुए उस राजाने ‘ब्राह्मणका प्रत्याख्यान नहीं करना चाहिये’ यह मानते हुए तथा ‘विद्याका नियमानुसार ही उपदेश करना चाहिये’ यह समझते हुए— |
तꣳह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तꣳहोवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान्गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥
उसे ‘यहाँ चिरकालतक रहो’ ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—‘हे गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला—॥ ७ ॥
| तं ह गौतमं चिरं दीर्घकालं वसेत्येवमाज्ञापयाञ्चकाराज्ञप्तवान्। यत्पूर्वं प्रत्याख्यातवान्राजा | उस गौतमको उसने 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी । राजाने पहले जो विद्याका प्रत्या- |