भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 488
४८४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| असौ वाव लोकोऽग्निर्ह गौतम यथाग्निहोत्राधिकरणमाहवनीय इह। तस्याग्नेर्द्युलोकाख्यस्यादित्य एव समित्, तेन हीद्धोऽसौ लोको दीप्यते अतः समिन्धनात्समिदादित्यः। रश्मयो धूमस्तदुत्थानात्, समिधो हि धूम उत्तिष्ठति। अहरर्चिः प्रकाशसामान्यात्, आदित्यकार्यत्वाच्च। चन्द्रमा अङ्गाराः, अहःप्रशमेऽभिव्यक्तेः अर्चिषो हि प्रशमेऽङ्गारा अभिव्यज्यन्ते। नक्षत्राणि विस्फुलिङ्गाश्चन्द्रमसोऽवयवा इव विप्रकीर्णत्वसामान्यात् ॥ १ ॥ | हे गौतम ! जिस प्रकार इस लोकमें आहवनीयाग्नि अग्निहोत्रका अधिकरण है उसी प्रकार यह प्रसिद्ध लोक ही अग्नि है। उस द्युलोकसंज्ञक अग्निका आदित्य ही समिध् है; उससे सम्यक्प्रकारसे दीप्त हुआ ही यह लोक देदीप्यमान होता है; अतः सम्यक् प्रकारसे इन्धन (दीपन) करनेके कारण आदित्य ही समिध् (इन्धन) है। उससे निकलनेके कारण किरणें धूम हैं, क्योंकि समिध्से ही धूम निकला करता है। प्रकाशमें समानता और आदित्यका कार्य होनेके कारण दिन ज्वाला है। चन्द्रमा अङ्गार है, क्योंकि यह दिनके शान्त होनेपर अभिव्यक्त होता है; लौकिक अङ्गारे भी ज्वालाके शान्त होनेपर ही प्रकट हुआ करते हैं। तथा चन्द्रमाके अवयवोंके समान नक्षत्रगण विस्फुलिङ्ग हैं, क्योंकि इधर-उधर छिटके रहनेमें [विस्फुलिङ्गोंके साथ] उनकी समानता है ॥ १ ॥ |


तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा संभवति ॥ २ ॥