भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ५०३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यदु चैवास्मिञ्शव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेव" इति लिङ्गादुत्तरेण ते गच्छन्ति ।के ) “इस (सगुण ब्रह्मोपासक) के लिये प्रेतकर्म करें अथवा न करें वह अर्चिरादि मार्गको ही प्राप्त होता है” इस श्रुतिरूप लिङ्गके अनुसार उत्तर मार्गसे ही जाते हैं ।
नन्वूर्ध्वरेतसां गृहस्थानां च समान आश्रमित्वे ऊर्ध्वरेतसामेवोत्तरेण पथा गमनं न गृहस्थानामिति न युक्तमग्निहोत्रादिवैदिककर्मबाहुल्ये च सति ।**शङ्का—**ऊर्ध्वरेता और गृहस्थ—ये दोनों आश्रमी होनेमें समान ही हैं । अतः उनमें केवल ऊर्ध्वरेताओंका ही उत्तरायणमार्गसे गमन होता है, गृहस्थोंका अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मोंकी बहुलता होनेपर भी नहीं होता—यह ठीक नहीं है ।
नैष दोषः, अपूता हि ते । (ऊर्ध्वरेतसां वनौकसां च उत्तरमार्ग एव) शत्रुमित्रसंयोगनिमित्तं हि तेषां रागद्वेषौ तथा धर्माधर्मौ हिंसानुग्रहनिमित्तौ । हिंसानृतमायाब्रह्मचर्यादि च बहुशुद्धिकारणमपरिहार्यं तेषाम्, अतोऽपूताः । अपूतत्वान्नोत्तरेण पथा गमनम् । हिंसानृतमायाब्रह्मचर्यादिपरिहाराच्च शुद्धात्मा-**समाधान—**यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे अपवित्र होते हैं । शत्रु और मित्रोंका संयोग रहनेके कारण उनमें राग-द्वेष रहते हैं तथा हिंसा और कृपाके कारण धर्माधर्म भी रहते ही हैं । उनके लिये हिंसा, अनृत, कपट और अब्रह्मचर्य आदि बहुतसे अशुद्धिके कारण अनिवार्य ही हैं; इसलिये वे अपवित्र हैं । अपवित्र होनेके कारण उनका उत्तर मार्गसे गमन नहीं हो सकता । किंतु दूसरे वानप्रस्थादि हिंसा, अनृत, माया और अब्रह्मचर्यका त्याग कर देनेके कारण शुद्धचित्त हो जाते हैं, शत्रु-