भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 508
५०४छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

| नो हीतरे शत्रुमित्ररागद्वेषादिपरिहाराच्च विरजसस्तेषां युक्त उत्तरः पन्थाः । | मित्रसम्बन्धी भाव और राग-द्वेषका त्याग कर देनेसे वे मलहीन हो जाते हैं; अतः उनके लिये उत्तर मार्ग ठीक ही है। | | तथा च पौराणिकाः “ये प्रजामीषिरेऽधीरास्ते श्मशानानि भेजिरे । ये प्रजां नेषिरे धीरास्तेऽमृतत्वं हि भेजिरे” इत्याहुः । | तथा पौराणिक लोग भी ऐसा कहते हैं कि “जिन मन्दमति पुरुषोंने संतानकी इच्छा की वे श्मशानको ही प्राप्त हुए, किंतु जिन बुद्धिमानोंने संतानकी इच्छा नहीं की वे अमरत्वको ही प्राप्त हुए”। | | इत्थंविदां गृहस्थानामरण्यवासिनां च समानमार्गत्त्वेऽमृतत्वफले च सत्यरण्यवासिनां विद्यानर्थक्यं प्राप्तम् । तथा च श्रुतिविरोधः “न तत्र दक्षिणा यन्ति नाविद्वांसस्तपस्विनः” इति “स एनमविदितो न भुनक्ति” इति च विरुद्धम् । | शङ्का—इस प्रकार जाननेवाले गृहस्थ और वनवासियोंको समानमार्ग और अमृतत्वरूप फल प्राप्त होनेपर तो वनवासियोंके ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती है और ऐसा होनेसे “वहाँ दक्षिणमार्गी और अज्ञानी तपस्वी नहीं जाते” इस श्रुतिसे विरोध आता है तथा “अपना ज्ञान न होनेपर वह (परमात्मा) इस जीवका [मोक्षदानद्वारा] पालन नहीं करता” यह कथन भी विपरीत हो जाता है। | | न; आभूतसंप्लवस्थानस्यामृतत्वेन विवक्षितत्वात् । तत्रैवोक्तं पौराणिकैः—“आभूतसंप्लवं स्थान- | समाधान—नहीं, क्योंकि यहाँ अमृतत्वसे भूतोंके प्रलयपर्यन्त रहना ही अभिप्रेत है। इसी सम्बन्धमें पौराणिकोंने कहा है कि “भूतोंके प्रलयपर्यन्त रहना अमृतत्व ही |