भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 51

द्वितीय खण्ड

प्राणोपासनाकी उत्कृष्टता सूचित करनेवाली आख्यायिका

देवासुरा ह वै यत्र संयेतिरे उभये प्राजापत्या-
स्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम
इति ॥ १ ॥

प्रसिद्ध है, [पूर्वकालमें] प्रजापतिके पुत्र देवता और असुर किसी कारणवश परस्पर युद्ध करने लगे। उनमेंसे देवताओंने यह सोचकर कि, इसके द्वारा इनका पराभव करेंगे, उद्गीथका अनुष्ठान किया ॥ १ ॥

| [आख्यायिकार्थनिर्वचनम्]<br>देवासुरा देवाश्चासुराश्च। देवा दीव्यतेर्द्योतनार्थस्य शास्त्रोद्भासिता इन्द्रियवृत्तयः। असुरास्तद्विपरीताः स्वेष्वेवासुषु विष्वग्विषयासु प्राणनक्रियासु रमणात्स्वाभाविक्यस्तमआत्मिका इन्द्रियवृत्तय एव। ह वा इति पूर्ववृत्तोद्भासकौ निपातौ। यत्र यस्मिन्निमित्त इतरेतरविषयापहारलक्षणे संये- | देवासुराः—देवता और असुरगण। 'देव' शब्द द्योतनार्थक 'दिव्' धातुसे सिद्ध हुआ है। इसका अभिप्राय शास्त्रालोकित इन्द्रियवृत्तियाँ हैं। तथा उसके विपरीत, जो अपने ही असुओं (प्राणों) में यानी विविध विषयोंमें जानेवाली प्राणनक्रियाओंमें (जीवनोपयोगी प्राणव्यापारोंमें) ही रमण करनेवाली होनेके कारण स्वभावसे ही तमोमयी इन्द्रियवृत्तियाँ हैं, वे ही 'असुर' कहलाती हैं। 'ह' और 'वै' ये पूर्ववृत्तान्तको सूचित करनेवाले निपात हैं। 'यत्र' जिस निमित्तसे अर्थात् एक-दूसरेके विषयोंके अप- |