छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| पद्मरागादिमणिविक्रये वणिजो विज्ञानाधिक्यात्फलाधिक्यम् । तस्माद्यदेव विद्यया विज्ञानेन युक्तः सन् करोति कर्म श्रद्धया श्रद्धावानश्च सन्नुपनिषदा योगेन युक्तश्चेत्यर्थः, तदेव कर्म वीर्यवत्तरमविद्वत्कर्मणोऽधिकफलं भवतीति । विद्वत्कर्मणो वीर्यवत्तरत्ववचनादविदुषोऽपि कर्म वीर्यवदेव भवतीत्यभिप्रायः ।<br><br>न चाविदुषः कर्मण्यनधिकारः । औषस्त्ये काण्डेऽविदुषामप्यार्त्विज्यदर्शनात् । रसतमाप्तिसमृद्धिगुणवदक्षरमित्येकमुपासनम्, मध्ये प्रयत्नान्तरादर्शनात् । अनेकैर्हि विशेषणैरनेकधोपास्यत्वात् खल्वेतस्यैव प्रकृतस्योद्गीथाख्यस्याक्षरस्यौपव्याख्यानं भवति ॥ १० ॥ | इन दोनोंमेंसे व्यापारीको पद्मरागादि मणियोंकी बिक्रीका अधिक ज्ञान होनेके कारण अधिक फल होता है । अतः विद्या अर्थात् विज्ञानसे युक्त होकर श्रद्धासे यानी श्रद्धालु होकर और उपनिषद् अर्थात् योगसे युक्त होकर जो कर्म करता है वही प्रबलतर होता है—अविद्वान्के कर्मसे अधिक फल देनेवाला होता है । विद्वान्का कर्म प्रबलतर बतलाया गया है, इससे यह अभिप्राय सूचित होता है कि अविद्वान्का भी कर्म प्रबल तो होता ही है ।<br><br>अविद्वान्का कर्ममें अधिकार न हो—ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि औषस्त्यकाण्डमें (इस अध्यायके दशम खण्डमें) अविद्वानोंको भी ऋत्विक्कर्म करते देखा जाता है । वह अक्षर रसतम् तथा आप्ति और समृद्धि गुणोंसे युक्त है—ऐसी एक उपासना है, क्योंकि इसका निरूपण करते समय बीचमें कोई और प्रयत्न नहीं देखा गया। अनेकों विशेषणों द्वारा अनेक प्रकारसे उपास्य होनेके कारण निश्चय ही यह सब इस उद्गीथसंज्ञक प्रकृत अक्षर (ॐ)की ही व्याख्या है॥ १० ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथम खण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥