भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 978 में से

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पृष्ठ 514
५१०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५ ]
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
वृत्त्यर्थम्, तद्वतः; इष्टापूर्ते इष्टमग्निहोत्रादि वैदिकं कर्म, पूर्तं वापीकूपतडागारामदिकरणम्; दत्तं बहिर्वेदि यथाशक्त्यर्थिभ्यो द्रव्यसंविभागो दत्तम्; इत्येवंविधं परिचरणपरित्राणाद्युपासते, इतिशब्दस्य प्रकारदर्शनार्थत्वात्।<br><br>ते दर्शनवर्जितत्वाद्धूमं धूमाभिमानिनीं देवतामभिसंभवन्ति प्रतिपद्यन्ते।असाधारण विशेषण है। 'इष्टापूर्ते'—अग्निहोत्र आदि वैदिक कर्मको 'इष्ट' कहते हैं तथा वापी, कूप, तड़ाग एवं बगीचे आदि लगवानेका नाम पूर्त है; और वेदीसे बाहर दानपात्र व्यक्तियोंको यथाशक्ति धन देना 'दत्त' कहलाता है। इस प्रकार जो परिचर्या (गुरुशुश्रूषा) एवं परित्राण (धर्मरक्षा) आदिका तत्परतापूर्वक सेवन करते हैं—क्योंकि यहाँ 'इति' शब्द अनुष्ठानका प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये है—वे उपासनाशन्य होनेके कारण धूम—धूमाभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं।
तयातिवाहिता धूमाद्रात्रिं रात्रिदेवतां रात्रेर्परपक्षदेवतामेव कृष्णपक्षाभिमानिनीमपरपक्षाद्यान्षण्मासान्दक्षिणा दक्षिणां दिशमेति सविता, तान्मासान्दक्षिणायनषण्मासाभिमानिनीर्देवताः प्रतिपद्यन्त इत्यर्थः। संघचारिण्योउस धूमाभिमानी देवतासे अतिवाहित (आगे ले जाये जाते) हुए वे धूमसे रात्रिको—रात्रिदेवताको, रात्रिसे अपरपक्ष यानी कृष्णपक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिण दिशाकी ओर होकर चलता है उन महीनोंको अर्थात् दक्षिणायनके छः महीनोंके अभिमानी देवताको प्राप्त होते हैं—ऐसा इसका तात्पर्य है। ये षण्मासाभिमानी देवता एक
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