छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 534, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 534
| ५३० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तत्तत्र तेष्वनुशयिनां य इह लोके रमणीयं शोभनं चरणं शीलं येषां ते रमणीयचरणा रमणीयचरणेनोपलक्षितः शोभनोऽनुशयः पुण्यं कर्म येषां ते रमणीयचरणा उच्यन्ते। क्रौर्या-नृतमायावर्जितानां हि शक्य उपलक्षयितुं शुभानुशयसद्भावः। तेनानुशयेन पुण्येन कर्मणा चन्द्रमण्डले भुक्तशेषेणाभ्याशो ह क्षिप्रमेव, यदितिक्रियाविशे-षणम्, ते रमणीयां क्रौर्यादि-वर्जितां योनिमापद्येरन्प्राप्नु-युर्ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिय-योनिं वा वैश्ययोनिं वा स्व-कर्मानुरूपेण । | तत्-वहाँ उन अनुशयी जीवोंमें जिनका इस लोकमें रमणीय-शुभ चरण-शील होता है वे शुद्धाचारी जीव-जिनका रमणीयचरणसे उपलक्षित शुभ अनुशय यानी पुण्य-कर्म होता है-वे रमणीयचरण कहलाते हैं । जो लोग क्रूरता, असत्य और कपटसे रहित हैं उन्हींमें शुभानुशयकी सत्ता देखी जा सकती है । चन्द्रमण्डलके भोगसे बचे हुए उस पुण्य अनुशय यानी कर्मसे वे अभ्याश-शीघ्र ही रमणीय-क्रूरता आदिसे रहित योनिको प्राप्त होते हैं। यहाँ 'यत' शब्द क्रियाविशेषण है । अपने कर्मोंके अनुसार वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनिको प्राप्त करते हैं। |
| अथ पुनर्ये तद्विपरीताः कपू-यचरणोपलक्षितकर्माणोऽशुभानु-शया अभ्याशो ह यत्ते कपूयां यथाकर्म योनिमापद्येरन्कपूया-मेव धर्मसंबन्धवर्जितां जुगुप्सितां योनिमापद्येरञ्श्वयोनिं वा | किंतु उनसे विपरीत जो कपूय-चरणसे उपलक्षित कर्मवाले अर्थात् अशुभ अनुशयवाले होते हैं वे शीघ्र ही अपने कर्मानुसार कपूययोनिको प्राप्त होते हैं। कपूय-धर्मसम्बन्ध-से रहित अर्थात् निन्दनीय योनिको ही प्राप्त होते हैं। वे भी अपने |