भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 536
५१२छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ५

अथैतयोः पथोर्यथोक्तयोरर्चिर्धूमादिलक्षणयोर्न कतरेण अन्यतरेण च नापियन्ति । तानीमानि भूतानि क्षुद्राणि दंशमशककीटादीन्यसकृदावर्तीनि भवन्ति । अत उभयमार्गपरिभ्रष्टा ह्यसकृज्जायन्ते म्रियन्ते चेत्यर्थः । तेषां जननमरणसन्ततेरनुकरणमिदमुच्यते । जायस्व म्रियस्वेतीश्वरनिमित्तचेष्टोच्यते । जननमरणक्षणेनैव कालयापना भवति, न तु क्रियासु शोभनेषु भोगेषु वा कालोऽस्तीत्यर्थः ।वे इन पूर्वोक्त अर्चि आदि और धूमादि मागोंमेंसे किसी भी एकके द्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र प्राणी डाँस, मच्छर और कीड़े आदि बारम्बार आने-जानेवाले जीव होते हैं । अतः तात्पर्य यह है कि वे इन दोनों ही मागोंसे परिभ्रष्ट होकर बारम्बार जन्मते-मरते रहते हैं । यह उनके जन्म-मरणकी अविच्छिन्न परम्पराका अनुकरण कहा जाता है; 'जन्म लो और मरो' यह ईश्वरसम्बन्धी चेष्टा बतलायी जाती है*। अर्थात् उनका समय जन्म लेने और मरनेमें ही जाता है, कर्म करने अथवा सुन्दर भोग भोगनेके लिये उन्हें अवकाश ही नहीं मिलता ।
एतत्क्षुद्रजन्तुलक्षणं तृतीयं पूर्वोक्तौ पन्थानावपेक्ष्य स्थानं संसरताम्, येनैवं दक्षिणमार्गगा अपि पुनरागच्छन्ति, अनधिकृतानां ज्ञानकर्मणोरगमनमेव दक्षिणेन पथेति, तेनासौ लोको न सम्पूर्यते ।जन्म-मरण-परम्परामें पड़े हुए जीवोंका पहले दो मागोंकी अपेक्षा यह क्षुद्र जीवरूप तीसरा स्थान है । क्योंकि इस प्रकार दक्षिणमार्गगामी भी लौट आते हैं तथा ज्ञान और कर्मके अनधिकारियोंका तो दक्षिणमार्गसे वहाँ जाना भी नहीं होता, इसलिये यह परलोक नहीं भरता ।

  • ॐ तात्पर्य यह है कि उन जीवोंको दोनों मागोंसे पतित हुए देखकर मानो ईश्वर ही कहता है कि 'तुम जन्म लो और मरो।'