छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 537, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 537
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३१
| संस्कृत-भाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| पञ्चमस्तु प्रश्नः पञ्चाग्निविद्यया व्याख्यातः । प्रथमो दक्षिणोत्तरमार्गाभ्यामपाकृतः । दक्षिणोत्तरयोः पथोर्व्यावर्तनापि—मृतानामग्नौ प्रक्षेपः समानः, ततो व्यावर्तना, अन्येऽर्चिरादिना यन्ति, अन्ये धूमादिना, पुनरुत्तरदक्षिणायने षण्मासान्प्राप्नुवन्तः संयुज्य पुनर्व्यावर्तन्ते, अन्ये संवत्सरमन्ये मासेभ्यः पितृलोकम्—इति व्याख्याता । पुनरावृत्तिरपि क्षीणानुशयानां चन्द्रमण्डलादाकाशादिक्रमेणोक्ता । अमुष्य लोकस्यापूरणं स्वशब्देनैवोक्तम्, तेनासौ लोको न सम्पूर्यत इति । | [ उपर्युक्त प्रश्नोंमेंसे ] पाँचवें प्रश्नकी व्याख्या पञ्चाग्निविद्याद्वारा की गयी; प्रथम प्रश्नका अपाकरण दक्षिण एवं उत्तरमार्गके वर्णनसे किया गया । तथा—मरे हुए उपासक और कर्मठ इनको अग्निमें डालना एक समान होता है, वहाँसे आगे उनका वियोग होता है, उनमेंसे एक अर्चि आदि मार्गसे जाते हैं और दूसरे धूमादि मार्गसे; फिर उत्तरायण और दक्षिणायन—इन छः-छः मासोंको प्राप्त होकर वे एक बार मिलकर फिर बिछुड़ जाते हैं । उनमेंसे एक तो संवत्सरको प्राप्त होते हैं और दूसरे मासाभिमानी देवताओंसे पितृलोकको जाते हैं—इस प्रकार दक्षिण और उत्तर मार्गोंकी व्यावर्तना—व्यावृत्तिकी भी व्याख्या की गयी । जिनका अनुशय (कर्म) क्षीण हो गया है, उन जीवोंकी चन्द्रमण्डलसे आकाशादि क्रमसे पुनरावृत्ति भी बतला दी गयी । इस परलोककी अपूर्तिका तो 'तेनासौ लोको न सम्पूर्यते' ऐसे प्रत्यक्ष शब्दोंसे ही उल्लेख कर दिया गया । |
| यस्मादेवं कष्टा संसारगतिस्तस्माज्जुगुप्सेत । यस्माच्च | क्योंकि इस प्रकार संसारगति अत्यन्त कष्टमयी है, इसलिये उससे घृणा करनी चाहिये । क्योंकि |