भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 540

एकादश खण्ड


| दक्षिणेन पथा गच्छतामन्नभाव उक्तः--'तद्देवानामन्नम्' 'तं देवा भक्षयन्ति' इति; क्षुद्रजन्तुलक्षणा च कष्टा संसारगतिरुक्ता । तदुभयदोषपरिजिहीर्षया वैश्वानरात्तृभावप्रतिपत्त्यर्थमुत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते, 'अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियम्' इत्यादिलिङ्गात् । आख्यायिका तु सुखावबोधार्था विद्यासंप्रदानन्यायप्रदर्शनार्था च । | 'वह देवताओंका अन्न है' देवगण उसका भक्षण करते हैं'—ऐसा कहकर दक्षिणमार्गसे जानेवालोंके अन्नभावका प्रतिपादन किया गया तथा क्षुद्रजन्तुरूप संसारकी कष्टमयी गति भी बतलायी गयी । उन दोनों दोषोंको त्यागनेकी इच्छासे वैश्वानरसंज्ञक भोक्तृत्वकी प्राप्तिके लिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—जैसा कि 'तू अन्न भक्षण करता है, प्रियको देखता है' इत्यादि लिङ्गोंसे जाना जाता है । यहाँ जो आख्यायिका है वह सरलतासे समझानेके लिये और विद्याप्रदानकी उचित विधि प्रदर्शित करनेके लिये है । |

औपमन्यव आदिका आत्ममीमांसाविषयक प्रस्ताव

प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं ब्रह्मेति ॥ १ ॥

उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लविके पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्वका पुत्र