छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
फिर उन्होंने चक्षुके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे विद्ध कर दिया। इसीसे लोक उससे देखनेयोग्य और न देखनेयोग्य दोनों प्रकारके पदार्थोंको देखता है, क्योंकि वह (चक्षु-इन्द्रिय) पापसे बिंधा हुआ है ॥ ४ ॥
अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ५ ॥
फिर उन्होंने श्रोत्रके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे बेध दिया। इसीसे लोक उससे सुननेयोग्य और न सुननेयोग्य दोनों प्रकारकी बातोंको सुनता है, क्योंकि वह (श्रोत्रेन्द्रिय) पापसे बिंधा हुआ है ॥ ५ ॥
अथ ह मन उद्गीथमुपासांचक्रिरे । तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तेनोभयँ संकल्पयते संकल्पनीयं चासंकल्पनीयं च पाप्मना ह्येतद्विद्धम् ॥ ६ ॥
फिर उन्होंने मनके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। असुरोंने उसे भी पापसे बेध दिया। इसीसे उसके द्वारा लोक संकल्प करनेयोग्य और संकल्प न करनेयोग्य दोनोंहीका संकल्प करता है, क्योंकि वह पापसे बिंधा हुआ है ॥ ६ ॥
| मुख्यप्राणस्योपास्यत्वाय तद्विशुद्धत्वानुभवार्थोऽयं विचारः श्रुत्या प्रवर्तितः। अतश्चक्षुरादि- | मुख्य प्राणको उपास्य सिद्ध करनेके लिये उसकी विशुद्धताका अनुभव करानेके प्रयोजनसे श्रुतिने इस विचारका आरम्भ किया है। अतः चक्षु आदि |