छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| देवताः क्रमेण विचार्यासुरेण पाप्मना विद्धा इत्यपोह्यन्ते । समानमन्यत् । अथ ह वाचं चक्षुः श्रोत्रं मन इत्यादि । अनुक्ता अप्यन्यास्त्वग्रसनादिदेवता द्रष्टव्याः “एवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिः”(बृ०उ० १।३।६) इति श्रुत्यन्तरात्॥ ३–६॥ | देवता आसुर पापसे विद्ध हैं—इस प्रकार क्रमशः विचार करके उनका अपवाद किया जाता है। शेष सब भी इसीके समान हैं। इसी प्रकार उन्होंने वाक्, चक्षु, श्रोत्र और मन आदिको भी [पापसे विद्ध कर दिया] “इस प्रकार निश्चय ही ये देवता पापसे संयुक्त हैं” इस अन्य श्रुतिके अनुसार, यहाँ जिनका नाम नहीं लिया गया है, उन त्वक् एवं रसना आदि अन्य देवताओंको भी ऐसे ही पापविद्ध समझना चाहिये ॥ ३–६ ॥ |
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मुख्य प्राणद्वारा असुरोंका पराभव
| आसुरेण विद्धत्वादघ्राणादिदेवता अपोह्य— | आसुर पापसे विद्ध होनेके कारण घ्राणादि देवताओंका त्याग कर— |
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अथ ह य एवायं मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तँहासुरा ऋत्वा विदध्वंसुर्यथाश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेत ॥ ७ ॥
फिर यह जो प्रसिद्ध मुख्य प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की। उस (प्राणके) समीप पहुँचकर असुरगण इस प्रकार विध्वस्त हो गये जैसे दुर्भेद्य पाषाणके पास पहुँचकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है ॥७॥
| अथानन्तरं य एवायं प्रसिद्धो मुखे भवो मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासांचक्रिरे । तं हासुराः पूर्व- | अथ--इसके पश्चात् जो कि यह प्रसिद्ध मुख्य—मुखमें रहनेवाला प्राण है उसीके रूपमें उद्गीथकी उपासना की । असुरगण पूर्ववत् |
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