भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 978 में से

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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७


ननु नासिक्योऽपि प्राणो वा-<br>य्वात्मा यथा मुख्यस्तत्र नासि-<br>क्यः प्राणः पाप्मना विद्धः प्राण<br>एव सन्न मुख्यः कथम् ?<br><br>नैष दोषः; नासिक्यस्तु स्थान-<br>करणवैगुण्याद्विद्धो वाय्वात्मापि<br>सन्; मुख्यस्तु तदसंभवात्<br>स्थानदेवताबलीयस्त्वाच्च विद्ध<br>इति युक्तम् । यथा वास्याद् यः<br>शिक्षावत्पुरुषाश्रयाः कार्यविशेषं<br>कुर्वन्ति नान्यहस्तगतास्तद्वद्द्दोष-<br>बद्घ्राणसचिवत्वाद्विद्धा घ्राण-<br>देवता न मुख्यः ॥ ८ ॥शंका—जैसा कि मुख्य प्राण है उसी प्रकार नासिकास्थित प्राण भी तो वायुरूप ही है; किंतु प्राणरूप होते हुए भी केवल नासिकागत प्राण ही पापसे विद्ध है, मुख्य प्राण नहीं है—सो कैसे ?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है। नासिकामें रहनेवाला प्राण तो वायुरूप होनेपर भी स्थानावच्छिन्न इन्द्रियके दोषके कारण असुरोंद्वारा पापसे विद्ध हो गया है; किंतु मुख्य प्राण आश्रयदोषकी असम्भवताके कारण तथा स्थानदेवतासे प्रबलतर होनेके कारण पापसे विद्ध नहीं हुआ—यह उचित ही है। जिस प्रकार बसूला आदि औजार सुशिक्षित पुरुषके हाथमें रहनेपर विशेष कार्य करते हैं, किंतु दूसरेके हाथमें पड़नेपर वैसा नहीं करते, उसी प्रकार दोषयुक्त घ्राणका साथी होनेके कारण घ्राणदेवता पापसे विद्ध है और मुख्य प्राण पापविद्ध नहीं है ॥ ८ ॥
यस्मान्न विद्धोऽसुरैर्मुख्यस्त-<br>स्मात्—क्योंकि मुख्य प्राण असुरोंद्वारा पापविद्ध नहीं हुआ, इसलिये—
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