छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 623, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१९
| मूर्तं रूपवद्द्रव्यं प्रत्याख्याय वाय्वाकाशयोस्तद्गुणयोर्गन्धरसयोर्वा ग्रहणमस्ति ।<br><br>अथवा रूपवतामपि त्रिवृत्करणं प्रदर्शनार्थमेव मन्यते श्रुतिः । यथा तु त्रिवृत्कृते त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्, तथा पञ्चीकरणेऽपि समानो न्याय इत्यतः सर्वस्य सद्विकारत्वात्सता विज्ञातेन सर्वमिदं विज्ञातं स्यात्सदेकमेवाद्वितीयं सत्यमिति सिद्धमेव भवति । तदेकस्मिन्सति विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति सूक्तम् ॥ २-४ ॥ | क्योंकि रूपवान् मूर्त्त पदार्थोंको छोड़कर वायु और आकाशका तथा उनके गुण एवं गन्ध और रसका ग्रहण ही नहीं हो सकता ।<br><br>अथवा इन रूपवान् पदार्थोंके त्रिवृत्करणको भी श्रुति प्रदर्शनके ही लिये मानती है। जिस प्रकार त्रिवृत्करणमें तीन रूप ही सत्य हैं उसी प्रकार पञ्चीकरणमें भी समान नियम ही समझना चाहिये। इस प्रकार सब कुछ सत्का ही विकार होनेके कारण सत्के ज्ञानसे यह साराका सारा जान लिया जाता है। अतः एकमात्र अद्वितीय सत् ही सत्य है—यह सिद्ध ही है। इसलिये यह ठीक ही कहा है कि उस एकको जान लेनेपर यह सब जान लिया जाता है ॥ २-४ ॥ |
एतद्ध स्म वै तद्विद्वाꣳस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदाञ्चक्रुः ॥ ५ ॥
इस (त्रिवृत्करण) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं कह सकेगा, क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब कुछ जानते थे ॥ ५ ॥