छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 633, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 633
षष्ठ खण्ड
—: ० :—
अन्न आदिका सूक्ष्म भाग ही मन आदि होता है
दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥
हे सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है ॥ १ ॥
| दध्नः सोम्य मध्यमानस्य योऽणिमाणुभावः स ऊर्ध्वः समुदीषति संभूयोर्ध्वं नवनीतभावेन गच्छति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो अणिमा—सूक्ष्मांश होता है वह 'ऊर्ध्वः समुदीषति'—इकट्ठा होकर नवनीतरूपसे ऊपर आ जाता है। वह घृत होता है ॥ १ ॥ |
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| यथायं दृष्टान्तः— | जैसा कि यह दृष्टान्त है— |
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एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥
उसी प्रकार हे सोम्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् प्रकारसे ऊपर आ जाता है, वह मन होता है ॥ २ ॥
| एवमेव खलु सोम्यान्नस्यौदनादेरश्यमानस्य भुज्यमानस्यौदर्येणाग्निना वायुसहितेन खजेनेव मध्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति;तन्मनो भवति, मनो- | उसी प्रकार हे सोम्य ! अश्यमान अर्थात् भक्षण किये जाते हुए भात आदि अन्नका जो सूक्ष्म भाग होता है वह मथानीके समान वायुसहित जठराग्निद्वारा मथे जानेपर ऊपर आ जाता है, वह |
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