भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 634

६३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६

ऽवयवैः सह संभूय मन उपचिनोतीत्येतत् ॥ २ ॥मन होता है, अर्थात् मनके अवयवोंके साथ मिलकर मनकी पुष्टि करता है ॥ २ ॥

—: ॐ :--

तथा—तथा—

अपाꣳसोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥

हे सोम्य ! पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह प्राण होता है ॥ ३ ॥

अपां सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवतीति ॥ ३ ॥हे सोम्य ! पीये हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है; वह प्राण होता है—ऐसा [ आरुणिने कहा ] ॥३॥

एवमेव खलु—ठीक इसी प्रकार—

तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥

हे सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है और वह वाणी होता है ॥ ४ ॥

सोम्य तेजसोऽश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग्भवति ॥ ४ ॥हे सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका जो सूक्ष्म अंश होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है और वह वाणी होता है ॥४॥