छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 644, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 644
अष्टम खण्ड
— : ० : —
सुषुप्तिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश
| यस्मिन्मनसि जीवेनात्मनानुप्रविष्टा परा देवता—आदर्श इव पुरुषः प्रतिबिम्बेन जलादिष्विव च सूर्यादयः प्रतिबिम्बैः, तन्मनोऽन्नमयं तेजोऽम्मयाभ्यां वाक्प्राणाभ्यां संगतमधिगतम् । यन्मयो यत्स्थश्च जीवो मननदर्शनश्रवणादिव्यवहाराय कल्पते तदुपरमे च स्वं देवतारूपमेव प्रतिपद्यते । | दर्पणमें प्रतिबिम्बरूपसे प्रविष्ट हुए पुरुष और जलादिकमें आभासरूपसे प्रविष्ट हुए सूर्यादिकके समान जिस मनमें परदेवता जीवात्मरूपसे अनुप्रविष्ट हुआ है और जिसमें स्थित हुआ तथा जिससे तादात्म्यको प्राप्त हुआ जीव मनन, दर्शन एवं श्रवणादि व्यापारमें समर्थ होता है तथा जिसके निवृत्त होनेपर वह अपने परदेवतारूपको ही प्राप्त हो जाता है वह मन अन्नमय है और तेजोमयी वाक् एवं जलमय प्राणके साथ सम्बद्ध है—ऐसा ज्ञात हुआ। |
| तदुक्तं श्रुत्यन्तरे—‘‘ध्यायतीव लेलायतीव सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति’’ (बृ० उ० ४ । ३ । ७) ‘‘स वा अयमात्मा ब्रह्म विज्ञानमयो मनोमयः’’ (बृ० उ० ४ । ४ । ५) इत्यादि ‘‘स्वप्नेन शारीरम्’’ (बृ० उ० ४ । ३ । ११) | इस विषयमें अन्य (वाजसनेय) श्रुतिमें भी ऐसा कहा है—‘‘[मन और प्राणसे सम्बद्ध हुआ यह आत्मा] मानो ध्यान-सा करता है, चेष्टा-सी करता है, वह वासनायुक्त हुआ स्वप्नरूप होकर इस लोकका अतिक्रमण कर जाता है’’ ‘‘वह यह आत्मा ब्रह्म विज्ञानमय और मनोमय है’’ इत्यादि, तथा ‘‘स्वप्नसे शरीरको [निश्चेष्ट कर]’’ इत्यादि |