छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 655, कुल 978 में से
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५१
| शुङ्गोऽङ्कुर उत्पतित उद्गतः; तमिमं शुङ्गं कार्यं शरीराख्यं वटादिशुङ्गवदुत्पतितं हे सोम्य विजानीहि । किं तत्र विज्ञेयम् ? इत्युच्यते—शृण्विदं शुङ्गवत्कार्यत्वाच्छरीरं नामूलं मूलरहितं भविष्यति ॥ ३ ॥ | के समान उत्पन्न हुआ है। हे सोम्य ! वटादिके अङ्कुरके समान उत्पन्न हुए उस इस शरीरसंज्ञक शुंग—कार्यको तू जान । उसमें क्या विज्ञेयं है ? सो बतलाया जाता है—सुन, अङ्कुरके समान कार्यरूप होनेके कारण यह शरीर अमूल—कारणरहित नहीं हो सकता ॥ ३ ॥ |
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| इत्युक्त आह श्वेतकेतुः—<br>यद्येवं समूलमिदं शरीरं वटादिशुङ्गवत्तस्यास्य शरीरस्य क्व मूलं स्याद्भवेदित्येवं पृष्ट आह पिता— | [ आरुणिद्वारा ] इस प्रकार कहे जानेपर श्वेतकेतु बोला 'यदि इस प्रकार वटादिके अङ्कुरके समान यह शरीर समूल है तो इसका मूल कहाँ हो सकता है ? इस प्रकार पूछे जानेपर पिताने कहा— |
तस्य क्व मूलꣳस्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यानेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजो मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥
अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ? इसी प्रकार हे सोम्य ! तू अन्नरूप शुंगके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप शुङ्गके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप शुङ्गके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसंधान कर । हे सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ४ ॥