भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 657

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५३


| देहशुङ्गोऽन्नमूल एवमेव खलु सोऽस्यान्नेन शुङ्गेन कार्यभूतेनापो मूलमन्नस्य शुङ्गस्यान्विच्छ प्रतिपद्यस्व। अपामपि विनाशोत्पत्तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमेवेति, अद्भिः सोम्य शुङ्गेन कार्येण कारणं तेजो मूलमन्विच्छ। तेजसोऽपि विनाशोत्पत्तिमत्त्वाच्छुङ्गत्वमिति, तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमेकमेवाद्वितीयं परमार्थसत्यम्। | जिस प्रकार देहरूप अङ्कुर अन्नमूलक है उसी प्रकार कार्यभूत अन्नरूप अङ्कुरके द्वारा तू अन्नरूप अङ्कुरके मूल जलको खोज-प्राप्त कर। जल भी उत्पत्ति-नाशवान् होनेके कारण अङ्कुररूप ही है; अतः हे सोम्य! जलरूप शुंग यानी कार्यके द्वारा तू उसके मूल कारण तेजको खोज। नाशोत्पत्तिमान् होनेके कारण तेजका भी शुंगत्व ही है; अतः हे सोम्य! तेजरूप शुंगके द्वारा तू एकमात्र अद्वितीय परमार्थ सत्य सद्रूप मूलकी शोध कर। | | यस्मिन्सर्वमिदं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं रज्ज्वामिव सर्पादिविकल्पजातमध्यस्तमविद्यया तदस्य जगतो मूलमतः सन्मूलाः सत्कारणा हे सोम्येमाः स्थावरजङ्गमलक्षणाः सर्वाः प्रजा न केवलं सन्मूला एवेदानीमपि स्थितिकाले सदायतना सदाश्रया एव ! न हि मृदमाश्रित्य घटादेः सत्त्वं स्थितिर्वास्ति। अतो मृद्वत्सन्मूलत्वात्प्रजानां सदाय- | जिस सद्रूप मूलमें यही वाणीरूप आश्रयवाला नाममात्र विकार रज्जुमें सर्पके समान अविद्यासे अध्यस्त है वही इस जगत्का मूल है। अतः हे सोम्य! यह स्थावर-जंगमरूप सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सद्रूप कारणवाली है। यह सन्मूलक ही नहीं, इस समय स्थितिकालमें भी सदायतना अर्थात् सद्रूप आश्रयवाली ही है, क्योंकि मृत्तिकाको आश्रय किये बिना घटादिकी सत्ता अथवा स्थिति है ही नहीं। अतः मृत्तिकाके समान सन्मूलक होनेके कारण |