भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 659

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५५


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
ऽन्नशृङ्गं देहं क्लेदयन्त्यः शिथिलीकुर्युरब्बाहुल्याद्यदि तेजसा न शोष्यन्ते । नितरां च तेजसा शोष्यमाणास्वप्सु देहभावेन परिणममानासु पातुमिच्छा पुरुषस्य जायते । तदा पुरुषः पिपासति नाम ।<br><br>तदेतदाह--तेज एव तत्तदा पीतमन्वादि शोषयद्देहगतलोहितप्राणभावेन नयते परिणमयति । तद्यथा गोनाय इत्यादि समानमेवं तत्तेज आचष्टे लोक उदन्येत्युदकं नयतीत्युदन्यम् । उदन्येतिच्छान्दसं तत्रापि पूर्ववत् अपामप्येतदेव शरीराख्यं शृङ्गं नान्यदित्येवमादि समानमन्यत् ॥ ५ ॥जल, यदि उसे तेजके द्वारा शोषित न किया जाता तो अपनी बहुलताके कारण अन्नके अङ्कुरभूत देहको आर्द्र करके शिथिल कर देता । देहभावमें परिणत होते हुए जलके तेजद्वारा सर्वथा शोषित किये जानेपर ही पुरुषको जल पीनेकी इच्छा होती है । उसी समय पुरुष 'पिपासति' इस नामवाला होता है ।<br><br>उसी बातको श्रुति इस प्रकार कहती है--'उस समय पीये हुए जल आदिको तेज ही सुखाकर देहगत रक्त एवं प्राणभावको ले जाता है अर्थात् उसे रक्त एवं प्राणरूपमें परिणत कर देता है । उसे जिस प्रकार कि 'गोनाय' आदि शब्द हैं उसी प्रकार लोक उस तेजको 'उदन्या' उदकको ले जानेके कारण 'उदन्य' कहते हैं । तेजके अर्थमें भी 'उदन्या' यह प्रयोग पूर्ववत् (जलके अर्थमें 'अशनाया'के समान) छान्दस है । जलका भी यह शरीर नामक अङ्कुर ही है--उससे भिन्न नहीं है--इत्यादि शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥५॥