भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 978 में से

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पृष्ठ 662
३५८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ६

| शरीरमुपचिन्वन्तीत्युक्तम्। मांसं भवति लोहितं भवति मज्जा भवत्यस्थि भवतीति। ये त्वणिष्ठा धातवो मनः प्राणं वाचं देहस्यान्तःकरण संघातमुपचिन्वन्तीति चोक्तम्—तन्मनो भवति स प्राणो भवति सा वाग्भवतीति। | मध्यम भाग होता है वह सात धातुओंवाले*शरीरका पोषण करता है; यथा—'मांस होता है', 'लोहित होता है', 'मज्जा होता है', 'अस्थि होता है' इत्यादि। तथा यह भी बतलाया गया है कि उनका जो सूक्ष्मतम भाग होता है वह मन, प्राण और वाक् इस देहके अन्तःकरणसंघातका पोषण करता है। यथा—'वह मन होता है', 'वह प्राण होता है' 'वह वाक होती है' इत्यादि। | | सोऽयं प्राणकरणसंघातो देहे विशीर्णे देहान्तरं जीवाधिष्ठितो येन क्रमेण पूर्वदेहात्प्रच्युतो गच्छति तदाहास्य हे सोम्य पुरुषस्य प्रयतो म्रियमाणस्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनस्युपसंह्रियते। अथ तदाहुर्ज्ञातयो न वदतीति। मनःपूर्वो हि वाग्व्यापारः, "यद्धै मनसा ध्यायति | वह यह प्राण और इन्द्रियोंका संघात देहके नष्ट होनेपर जीवसे अधिष्ठित हुआ जिस क्रमसे पूर्व देहसे च्युत होकर अन्य देहको प्राप्त होता है उसका वर्णन आरुणि करता है—'हे सोम्य ! इस पुरुषके मरते समय वाणी मनको प्राप्त हो जाती है अर्थात् वाणीका मनमें उपसंहार हो जाता है। उस समय जातिवाले कहा करते हैं कि 'यह नहीं बोलता' क्योंकि वाणीका व्यापार तो मनःपूर्वक ही होता है; जैसा कि "जो बात मनसे सोचता |


* शरीरके आधारभूत सात धातु ये हैं-त्वचा, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि और वीर्य।