छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 663, कुल 978 में से
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खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६५९
| संस्कृत-मूल | हिन्दी-भाष्यार्थ |
|---|---|
| तद्वाचा वदति" (नृ० पू० ता० उ० १ । १) इति श्रुतेः । | है वही वाणीसे बोलता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । |
| वाच्युपसंहृतायां मनसि मनो मननव्यापारेण केवलेन वर्तते । | वाणीका मनमें उपसंहार हो जानेपर मन केवल मननव्यापार करता हुआ वर्तमान रहता है । |
| मनोऽपि यदोपसंह्रियते तदा मनः प्राणे सम्बद्धं भवति-सुषुप्तकाल इव; तदा पार्श्वस्था ज्ञातयो न विजानातीत्याहुः । प्राणश्च तदोर्ध्वोच्छवासी स्वात्मन्युपसंहृतबाह्यकरणः संवर्गविद्यायां दर्शनाद्धस्तपादादीन्विक्षिपन्मर्मस्थानानि निकृन्तन्निव उत्सृजन्क्रमेणोपसंहृतस्तेजसि सम्पद्यते । तदाहुर्ज्ञातयो न चलतीति । मृतो नेति वा विचिकित्सन्तो देहमालभमाना उष्णं चोपलभमाना देह उष्णो जीवतीति । यदा | जिस समय मनका भी उपसंहार होता है उस समय मन प्राणमें लीन हो जाता है । तब आस-पास बैठे हुए जातिवाले कहते हैं—'अब यह पहचानता नहीं है' उस समय, जिसने बाह्य इन्द्रियोंका अपनेमें उपसंहार कर लिया है वह प्राण ऊर्ध्वोच्छ्वासी होकर—क्योंकि संवर्ग विद्यामें※ [ प्राण, वागादिको अपनेमें लीन कर लेता है—ऐसा ] दिखलाया गया है—हाथ-पाँव पटकता हुआ मानो मर्मस्थानोंका छेदन करता बहिर्गत होनेके लिये क्रमशः उपसंहृत होकर तेजमें लीन हो जाता है । तब जातिवाले कहते हैं—'अब हिल-डुल नहीं सकता' । फिर यह शङ्का करते हुए कि अभी मरा है या नहीं वे देहका स्पर्श करते हैं और देहमें उष्णता देखकर कहते हैं 'अभी शरीर उष्ण है, अतः जीता है' । जिस समय |
※ देखिये छान्दोग्य० ४ । ३ । ३ ।