भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 978 में से

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पृष्ठ 673

खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ ६६९

| गता न विदुर्न जानन्तीयं गङ्गाहमस्मियं यमुनाहमस्मीति च ॥ १ ॥ | नदियाँ यह नहीं जानतीं कि 'यह मैं गङ्गा हूँ; यह मैं यमुना हूँ' इत्यादि ॥ १ ॥ |


एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिꣳहो वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दꣳशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति ॥ २ ॥ स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्‌विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्‌से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम सत्‌के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे हो फिर हो जाते हैं ॥ २ ॥ वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [तब आरुणिने] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

| एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजा यस्मात्सति सम्पद्य न विदु- स्तस्मात्सत्त आगम्य न विदुः सत | ठीक इसी प्रकार हे सोम्य ! ये सम्पूर्ण प्रजाएँ क्योंकि सत्‌में लीन होकर [अपना पार्थक्यज्ञान नहीं रहता, इसलिये] उस सत्‌से |