छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 681, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७७
| हाण्व्याऽणुतरा इवेमा धाना बीजानि पश्यामि भगव इति । आसां धानानामेकां धानामङ्ग हे वत्स भिन्द्धीत्युक्त आह भिन्ना भगव इति । यदि भिन्ना धाना तस्यां भिन्नायां किं पश्यसीत्युक्त आह न किञ्चन पश्यामि भगव इति ॥ १ ॥ | ‘भगवन् ! मैं इसमें ये अणु-अणुतर अत्यन्त छोटे दाने—बीज देखता हूँ।’ [ आरुणि— ] ‘हे वत्स ! इन धानोंमेंसे तू एक धानेको फोड़।’ इस प्रकार कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! फोड़ दिया।’ [ आरुणि— ] ‘अच्छा, यदि तूने धाना फोड़ दिया तो उस फूटे हुए धानेमें तू क्या देखता है ?’ ऐसा कहे जानेपर वह बोला—‘भगवन् ! मैं कुछ नहीं देखता’ ॥१॥ |
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तं होवाच यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान्न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धत्स्व सोम्येति ॥ २ ॥
तब उससे ( आरुणिने ) कहा—‘हे सोम्य ! इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता हे सोम्य ! उस अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है । हे सोम्य ! तू [इस कथनमें] श्रद्धा कर’ ॥२॥
| तं पुत्रं होवाच वटधानायां भिन्नायां यं वटबीजाणिमानं हे सोम्यैतं न निभालयसे न पश्यसि । तथाप्येतस्य वै किल सोम्यैष महान्न्यग्रोधो बीजस्या- | उस पुत्रसे ( आरुणिने ) कहा— ‘हे सोम्य ! वटके दानेके टूटनेपर जिस वटबीजकी अणिमाको तू नहीं देखता, तथापि हे सोम्य ! देख, निश्चय उसी बीजकी दिखायी न देनेवाली सूक्ष्म अणिमाका कार्यभूत |