छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 682, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें६७८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
| णिम्नः सूक्ष्मस्यादृश्यमानस्य कार्यभूतः स्थूलशाखास्कन्धफलपलाशवांस्तिष्ठत्युत्पन्नः सन्नुत्तिष्ठतीति वोच्छब्दोऽध्याहार्यः । अतः श्रद्धत्स्व सोम्य सत् एवाणिम्नः स्थूलं नामरूपादिमत्कार्यं जगदुत्पन्नमिति । <br><br> यद्यपि न्यायागमाभ्यां निर्धारितोऽर्थस्तथैवेत्यवगम्यते तथाप्यत्यन्तसूक्ष्मेष्वर्थेषु बाह्यविषयासक्तमनसः स्वभावप्रवृत्तस्यासत्यां गुरुतरायां श्रद्धायां दुरवगमत्वं स्यादित्याह—श्रद्धत्स्वेति । श्रद्धायां तु सत्यां मनसः समाधानं बुभुत्सतेऽर्थे भवेत्ततश्च तदर्थावगतिः “अन्यत्रमना अभूवम्” (बृ० उ० १।५।३) इत्यादिश्रुतेः॥२॥ | यह मोटी-मोटी शाखा, स्कन्ध, फल और पत्तोंवाला महान् वटवृक्ष स्थित है—उत्पन्न होकर खड़ा हुआ है इस प्रकार यहाँ 'तिष्ठति' क्रियाके पूर्व 'उत्' शब्दका अध्याहार करना चाहिये। इसलिये हे सोम्य! विश्वास कर कि नाम-रूपादिमान् स्थूल जगत् अत्यन्त सूक्ष्म सत्से ही उत्पन्न हुआ है।' <br><br> यद्यपि युक्ति और शास्त्र—इन दोनोंसे निश्चित हुआ अर्थ ऐसा ही है; तथापि गुरुतर श्रद्धाके न होने-पर बाह्य विषयोंमें आसक्तचित्त स्वभावसे ही प्रवृत्तिशील पुरुषका [ ऐसे ] अत्यन्त सूक्ष्म विषयोंमें प्रवेश होना बड़ा ही कठिन है—ऐसा समझकर आरुणिने कहा—'श्रद्धा कर।' क्योंकि श्रद्धाके होने-पर ही जिज्ञासित विषयमें मनका समाधान हो सकता है और तभी उस विषयका ज्ञान होना सम्भव है; जैसा कि 'मेरा मन दूसरी ओर था [ इसलिये मैं नहीं देख सका ]' इत्यादि श्रुतिसे प्रमाणित होता है॥२॥ |
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