छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 694, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६९० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| [ज्ञानानर्थक्योद्भावनम्]<br>ननु यथा सद्विज्ञानानन्तरमेव देहपातः सत्सम्पत्तिश्च न भवति कर्मशेषवशात्, यथाप्रवृत्तफलानि प्राग्ज्ञानोत्पत्तेर्जन्मान्तरसञ्चितान्यपि कर्माणि सन्तीति तत्फलोपभोगार्थं पतितेऽस्मिञ्छरीरान्तरमारब्धव्यम् । उत्पन्ने च ज्ञाने यावज्जीवं विहितानि प्रतिषिद्धानि वा कर्माणि करोत्येवेति तत्फलोपभोगार्थं चावश्यं शरीरान्तरमारब्धव्यम्; ततश्च कर्माणि ततः शरीरान्तरमिति ज्ञानानर्थक्यं कर्मणां फलवत्त्वात् ।<br><br>[ज्ञानात्कर्मक्षयाङ्गीकारेऽनुपपत्तिप्रदर्शनम्]<br>अथ ज्ञानवतः क्षीयन्ते कर्माणीति तदा ज्ञानप्राप्तिसमकालमेव ज्ञानस्य सत्सम्पत्तिहेतुत्वान्मोक्षः स्यादिति शरीरपातः स्यात् । तथा चाचार्याभाव इत्याचार्यवान्पुरुषो | पूर्व०—किंतु जिस प्रकार प्रारब्धकर्म अवशिष्ट रहनेके कारण सत्का ज्ञान होनेके बाद ही देहपात और सत्की प्राप्ति नहीं होती उसी प्रकार ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व तथा जन्मान्तरोंमें किये हुए और भी ऐसे संचित कर्म हैं ही जो अभी फल देनेमें प्रवृत्त नहीं हुए । अतः उनका फल भोगनेके लिये इस शरीरका पतन होनेपर दूसरे शरीरका प्राप्त होना आवश्यक है । ज्ञान उत्पन्न हो जानेपर भी पुरुष जीवनपर्यन्त विहित अथवा प्रतिषिद्ध कर्म करता ही है, अतः उनका फल भोगनेके लिये भी देहान्तरकी प्राप्ति अवश्य होनी चाहिये, उस समय फिर कर्म होंगे और उनसे फिर देहान्तरकी प्राप्ति होगी । इस प्रकार कर्मोंके फलयुक्त होनेके कारण ज्ञानकी व्यर्थता सिद्ध होती है ।<br><br>और यदि यह मानो कि ज्ञानीके कर्म क्षीण हो जाते हैं तो ज्ञान सत्सम्पत्तिका हेतु होनेके कारण ज्ञानप्राप्तिके समय ही मोक्ष हो जायगा, अतः उसी समय देहपात हो जाना चाहिये । ऐसा होनेपर आचार्यका अभाव हो जायगा; अतः 'आचार्यवान् पुरुषको ज्ञान होता है' यह वाक्य अनुपपन्न होगा तथा |
है अर्थात् देहपात होनेके ही समय वह सत्को प्राप्त हो जायगा । यदि देहपात और सत्की प्राप्तिमें कुछ कालका अन्तर होता तो 'अथ' का अनन्तर अर्थ किया जाता, पर ऐसा है नहीं अतः यहाँ 'अनन्तर' अर्थ ठीक नहीं है ।