भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 697

खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९३


| कर्मणामवश्यमेव फलोपभोगः स्यादिति मुक्तेषुवत् 'तस्य तावदेव चिरम्' इति युक्तमेवोक्तमिति यथोक्तदोषचोदनानुपपत्तिः । ज्ञानोत्पत्तेरूर्ध्वं च ब्रह्मविदः कर्माभावमवोचाम 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इत्यत्र तच्च स्मर्तुमर्हसि ॥ २ ॥ | कर्मोंका फलोपभोग अवश्य होना है इसलिये छोड़े हुए बाणके समान 'उसे [ सत्‌की प्राप्तिमें ] तभीतक विलम्ब है जबतक कि वह देहबन्धनसे नहीं छूटता' ऐसा ठीक ही कहा है, अतः उपर्युक्त दोषकी शङ्का करना ठीक नहीं। 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इस वाक्यकी व्याख्याके समय ज्ञानोत्पत्तिके पश्चात् तो हमने ब्रह्मवेत्ताके कर्मका अभाव प्रतिपादन किया है, उसे इस समय स्मरण करना चाहिये ॥ २ ॥ |


स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदꣳसर्वं तत्सत्यꣳस आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥

वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ ३ ॥

| स य इत्याद्युक्तार्थम् । आचार्यवान्विद्वान्येन क्रमेण सत्सम्पद्यते तं क्रमं दृष्टान्तेन भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति । तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ | 'स यः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पहले कहा जा चुका है। 'हे भगवन् ! आचार्यवान् विद्वान् जिस क्रमसे सत्‌को प्राप्त होता है वह क्रम मुझे दृष्टान्तद्वारा फिर समझाइये' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। तब आरुणिने कहा 'सोम्य ! अच्छा' ॥ ३ ॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठाध्याये चतुर्दशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥१४॥